तपते रेतीले धोरों में अधिक मतदान कराने वाले के सिर पर सजेगा जीत का सेहरा

  • सात सौ किलोमीटर इलाका सटा है पाकिस्तान से

युधिष्ठिर भूदंड 

जोधपुर. देश का दूसरे सबसे बड़ा संसदीय क्षेत्र बाड़मेर-जैसलमेर। इसका करीब सात सौ किलोमीटर लम्बा हिस्सा पाकिस्तान से सटा हुआ है। दूर-दूर तक फैला रेत का समंदर और भीषण गर्मी में तपते रेतीले धोरों पर रोजाना सैकड़ों किलोमीटर का सफर तय कर मतदाताओं तक पहुंचना किसी भी प्रत्याशी के लिए सबसे अहम चुनौती है। इस चुनौती को पार पाने के लिए भाजपा के कैलाश चौधरी मैदान में डटे है। उनका सामना स्वाभिमान की लड़ाई के नाम पर भाजपा त्याग कांग्रेस का हाथ थामने वाले मानवेन्द्र सिंह जसोल से है। खासियत की बात यह है कि दोनों प्रत्याशी चार माह पूर्व हुए विधानसभा चुनाव में पराजित हो चुके है। कभी भाजपा के कद्दावर नेता रहे और गत लोकसभा चुनाव में टिकट कटने के बाद यहां से निर्दलीय चुनाव लड़ने वाले जसवंत सिंह जसोल के साथ भाजपा में किए गए व्यवहार के नाम पर मानवेन्द्र सहानुभूति बटोरने में जुटे है। वहीं पहली बार लोकसभा चुनाव लड़ने जा रहे कैलाश चौधरी शुरुआती आपाधापी के बाद अब रविवार को प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की बाड़मेर में आयोजित सभा के बाद बने माहौल को देख पूरी तरह से उत्साह से लबरेज है। जातीय समीकरण में दोनों का पलड़ा बराबरी पर नजर आ रहा है। ऐसे में अब जीत का सेहरा उसी प्रत्याशी के सिर पर बंधेगा जो भीषण गर्मी में अपने समर्थकों से अधिक मतदान कराने में सफल रहेगा।

चुनावी तपिश में दफन हुए मुद्दे
क्षेत्र का सबसे बड़ा मुद्दा पेयजल संकट व चिकित्सा सुविधाएं है। लेकिन चुनावी तपिश में सभी मुद्दे रेतीले धोरों में दफन हो गए है। पाकिस्तान के साथ होने वाले किसी भी तनाव को सबसे पहले बाड़मेर-जैसलमेर के लोग महसूस करते है। इन क्षेत्रों में हमेशा सैन्य हलचल नजर आती रहती है। सर्जिकल स्ट्राइक के जवाब में मानवेन्द्र अपने दादा, ताऊ व पिता के सेना में दी गई सेवाओं का हवाला दे रहे है। मानवेन्द्र के ताऊ लेफ्टीनेंट जनरल हनूत सिंह को वर्ष 1971 के युद्ध में बड़ी संख्या में पाकिस्तान के टैंक तबाह करने पर महावीर चक्र से नवाजा गया था। ऐसे में इस सरहदी क्षेत्र में मुकाबला प्रधानमंत्री मोदी और मानवेन्द्र के स्वाभिमान के बीच सिमट कर रह गया है।

ऐसा है यहा के मतदाताओं का मिजाज

बाड़मेर-जैसलमेर संसदीय सीट से 1952 से अब तक हुए 16 लोकसभा चुनाव में 5 नए और 11 जाने-पहचाने चेहरों को चुनकर भेजा। तीन ऐसे सांसद रहे, जिन्हें जनता ने दूसरी बार मौका दिया, वहीं लगातार तीन बार सांसद बनने का रिकाॅर्ड कर्नल सोनाराम चौधरी के नाम दर्ज है। वे चौथी बार 2014 में भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़े और सांसद चुने गए। वहीं सबसे बड़ी जीत 2 लाख 71 हजार वोटों का रिकाॅर्ड मानवेंद्र सिंह के नाम दर्ज है। इसी तरह यहां से भाजपा की जीत का खाता खोलने का श्रेय भी मानवेन्द्र के नाम है। इस क्षेत्र में कांग्रेस की राजनीति हमेशा जाट मतदाताओं पर केन्द्रित रही। यह पहला अवसर है जब कांग्रेस ने किसी राजपूत को अपना प्रत्याशी बनाया है। ऐसे में इस बार जातीय समीकरण बदले हुए नजर आ रहे है।

दोनों प्रत्याशी रह चुके है विधायक
कैलाश चौधरी व मानवेन्द्र सिंह एक-एक बार बायतु व शिव से विधायक रह चुके है। जबकि तीन बार यहां से लोकसभा का चुनाव लड़ चुके मानवेन्द्र एक बार सांसद भी रह चुके है। वहीं चार माह पूर्व संपन्न हुए विधानसभा चुनाव में कैलाश को बायतु से व मानवेन्द्र को तत्कालीन मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे के सामने झालरापाटन से हार का सामना करना पड़ा।