कानपुर के 18 गांवों में होली के दिन नहीं खेलते हैं रंग, जानें क्या है 100 साल पुरानी परंपरा

श्रीमती विजय लक्ष्मी श्रीवास्तव

कानपुर,  शहर में होली के रंग यूं तो निराले है, लेकिन गंगा किनारे के 18 गांव में रंगपंचमी का अलग ही महत्व है। देशप्रेम की भावना से ओतप्रोत हो यहां रंग-गुलाल उड़ते हैं, जिसमें सभी सराबोर हो जाते है। यहां होली जलने के अगले दिन के बजाए रंगपंचमी के दिन जमकर होली खेली जाती है। इसके पीछे 100 साल पुरानी लगान विरोधी जंग की कहानी है जो अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ यहां के जमींदार ने छेड़ी थी। उस जंग की याद में क्षेत्र ऐसा डूबा कि आज यह परंपरा बन गई है।

अंग्रेज कलक्टर ने लगा दिया था भारी लगान

वर्ष 1917 के करीब वाजिदपुर निवासी जगन्नाथ इस क्षेत्र के जमींदार थे। उस समय अंग्रेज कलक्टर लुईस ने किसानों पर भारी लगान लगा दिया था। जगन्नाथ ने 18 गांवों के किसानों के साथ बैठक की और लगान के खिलाफ जंग छेड़ दी। अंग्रेजों ने साजिश कर जगन्नाथ को गिरफ्तार कर लिया। इससे आक्रोशित होकर किसान व ग्रामीणों ने जोरदार आंदोलन किया। इस दौरान होली का त्यौहार भी था, लेकिन किसी ने रंग नहीं खेला, क्योंकि आंदोलन के अगुवा जेल में थे। आंदोलन का इतना दबाव पड़ा कि घबराकर अंग्रेजों ने पंचमी के दिन उनको छोड़ दिया। इसके बाद गांव-गांव जुलूस निकालकर जमकर खुशी मनाई गई और रंग-गुलाल उड़ाया गया। उसी दिन से यहां पर पंचमी के दिन रंग खेलने की परंपरा चली आ रही।

इन क्षेत्रों में चल रही परंपरा

पूर्व विधायक रामकुमार बताते है कि उनके दादा जगन्नाथ की इस लड़ाई का असर यह हुआ कि आज यहां रंगपंचमी के दिन सभी रंग खेलते है। शहरी क्षेत्र के घाऊखेड़ा, देवीगंज, बीबीपुर, गंगा किनारे के वाजिदपुर, प्यौंदी गांव, शेखपुर, मोतीपुर, जानां गांव, किशनपुर, अलौलापुर समेत करीब 18 गांवों में पंचमी को रंग खेलते हैं।

बुजुर्ग सुनाते हैं किस्सा

प्यौंदी गांव के बुजुर्ग सोनेलाल यादव व शेखपुर के सुनील मांझी बताते हैं कि पिताजी व गांव के अन्य लोग लगान के खिलाफ छेड़ी जंग के बारे में बताया करते थे। आज के युवा पूछते हैं कि पंचमी को हम लोग क्यों रंग खेलते हैं तो उन्हें हम लोग पूरी बात बताते हैं। वह भी गर्व महसूस करते है और खुशी-खुशी पंचमी को जमकर रंग खेल इस परंपरा में शामिल होते हैं।