151 गज लंबी व 51 प्राकृतिक रंगों से बनी पगड़ी बनी आकर्षण का केंद्र

गणेश योगी 

टोंकरंगों के क्षेत्र में भी शिल्प गुरु बादशाह मियां ने टोंक का नाम देशभर में रोशन किया है। बादशाह मियां ने जड़ी बूटियों, पेड़ों के पत्ते आदि जो अनुपयोगी, कूड़े की रुप में नजर आते हैं। उनसे भी प्राकृतिक रंग निकालकर भारतीय कला को बढावा देने में अपनी महत्वपूर्ण भूमिका भी निभाई है। गत तीन माह पूर्व अपनी कला के बल पर बादशाह मियां ने अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी टोंक का नाम रोशन किया है। पूर्व राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी से सम्मानित हो चुके शिल्प गुरु बादशाह मियां को प्राकृतिक रंग बनाने के लिए इंटरनेशनल क्राफ्ट एवार्ड से नवाजा गया है। तीन माह पूर्व उनको ये अवार्ड केंद्रीय मंत्री मेनका गांधी द्वारा दिल्ली में प्रदान किया गया। साथ ही उनको क्राफ्ट आइकन ऑफ द ईयर 2018 भी घोषित किया गया है। ये सम्मान उनको 151 गज लंबी एवं 51 प्राकृतिक रंगों से बनाई गई पगड़ी के कारण मिला है। पुरानी टोंक निवाई दरवाजा क्षेत्र में 8 मई 1957 को पैदा हुए बादशाह मियां ने अपने पुश्तैनी कार्य के बल पर देश विदेश में 1981 से टोंक का नाम रोशन कर रहे हैं।

प्राकृतिक रंगों की कला भारत की देन :

बादशाह मियां का कहना है कि पिरामिडों में रखी सालों पुरानी मम्मी को नील का कपड़ा लपेट कर ही रखा जाता है। ये नील का रंगा कपड़ा जिसमें सैकंडों साल तक शव को मम्मी के रुप में रखा जाता है, वह भारत की ही देन हैं। इसपर भी उन्होंने शोध कर के इस बात को साबित करने की कोशिश की है।

प्राकृतिक रंगों ने साड़ियों की बढ़ाई कीमत

जड़ी बूटियों से कलर बनाकर साड़ियों को अद्भुत रंगों में रंगने से लहरिया साडी, जिसके एक लाइन में 32 से 36 कलर होते हैं। जिसकी कीमत लाखों में लग चुकी है। उनकी इस कला से राजस्थान की लहरिया साडी की विरासत को बढावा मिल रहा है। यही कारण है कि बादशाह मियां की कला अब लंदन तक पहचानी जाने लगी है।

कैली ग्राफी में भी हो स्टोन कलर का उपयोग

बादशाह मियां चाहते हैं कि कैली ग्राफी कला में भी स्टोन कलर का इस्तेमाल हो। ये कलर कागज नहीं खाते हैं तथा हजारों साल तक चलते हैं। इसे कैली ग्राफी आर्ट की कीमत बढ़ेगी। वो और आकर्षक लगेगी।

कैसे की शुरुआत :

बादशाह मियां का कहना है वह बीड़ी बनाने का कार्य करता था। उसके बाद उनकी मां ने उनको पुश्तैनी धंधे की ओर प्रेरित किया। प्राकृतिक रंग बनाए तथा लहरिया साड़ियां बनाने का कार्य शुरु किया। जो रंग उन्होंने बनाए हैं, उसका पानी भी पेड़ों में डालने से कोई नुकसान नहीं होता है। कपड़ा फट जाए, लेकिन उनका कलर खराब नहीं होता है। उनके कलर केमिकल कलर से हटकर प्राकृतिक है। जो नुकसानदायक नहीं है तथा ईको फ्रेंडली होने के साथ ही आकर्षक भी है।