नाराज विश्नोई समाज को साधने के लिए भाजपा ने जसवंत सिंह को बनाया प्रदेश उपाध्यक्ष

युधिष्ठिर भूदंड 

जोधपुर. भाजपा ने पूर्व सांसद जसवंत सिंह विश्नोई को प्रदेश उपाध्यक्ष बनाया है। विश्नोई इस बार जोधपुर सीट से टिकट के प्रबल दावेदार थे, लेकिन भाजपा ने राजपूत बाहुल्य इस सीट पर गजेंद्रसिंह शेखावत को ही दुबारा मैदान में उतारने का निर्णय लिया। विश्नोई ने प्रदेश से लेकर केंद्र के आला नेताओंं को अपनी नाराजगी का एहसास करवाया। हालांकि जोधपुर संसदीय सीट पर विश्नोई समाज भी निर्णायक भूमिका में रहता आया है, ऐसे में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष पद देने के पीछे भाजपा के विश्नोई समाज को साधने का एक हिस्सा माना जा रहा है।

जोधपुर लोकसभा क्षेत्र में विश्नोई समाज के दबदबे का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि यहां के आठ में से तीन विधायक विश्नोई समाज के है। इनमें से दो कांग्रेस व एक भाजपा से है। जोधपुर से दो बार सांसद रह चुके जसवंत सिंह का टिकट कटने से विश्नोई समाज में नाराजगी का माहौल है। उन्हें साधने के लिए भाजपा ने यह दाव खेला है। टिकट कटने के बाद से जसवंत सिंह ने पार्टी नेतृत्व को अपनी नाराजगी से अवगत करवा दिया था। इसके बाद वे निष्क्रिय हो घर बैठ गए। पार्टी को अहसास हो गया कि उन्हें मनाए बगैर विश्नोई समाज को अपने साथ जोड़ पाना मुश्किल होगा। इसी रणनीति के तहत चुनाव के बीच में उन्हें प्रदेश उपाध्यक्ष बना दिया। अब यह देखने वाली बात होगी कि विश्नोई समाज इस नियुक्ति से संतुष्ट हो पाता है या नहीं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में भी उन्होंने टिकट के लिए दौड़-भाग की थी, पर आखिरी वक्त पर भाजपा ने कांग्रेस प्रत्याशी चंद्रेश कुमारी के सामने युवा चेहरा गजेंद्रसिंह शेखावत को उतार दिया था। टिकट घोषणा के 3 दिन बाद शेखावत ने नामांकन दाखिल किया तब विश्नोई उनके साथ नजर नहीं आए। इस बात को भांपकर शेखावत उनके घर पर पहुंचे और आशीर्वाद भी लिया।

तोहफे में मिली थी सबसे पहली राजनीतिक नियुक्ति 
भाजपा ने विश्नोई को शेखावत के चुनाव में ईमानदारी से काम करने का तोहफा भी दिया। राजनीतिक नियुक्ति में सबसे पहले उनकी नियुक्ति ने सभी को चौका दिया था। केंद्र सरकार के गठन के ठीक तीन माह बाद 22 अगस्त 2014 को उन्हें सेंट्रल वूल बोर्ड का अध्यक्ष बनाकर दिया। राजस्थान विधानसभा चुनाव के ठीक पहले 9 मई 2018 को उन्हें राजस्थान खादी व ग्रामोद्योग बोर्ड का अध्यक्ष बनाया गया था। हालांकि प्रदेश में सरकार बदलने के बाद केबिनेट का दर्जा तो छीन लिया, लेकिन माणिकचंद सुराणा के मामले में हाईकोर्ट के फैसले के बाद सरकार उनसे यह पद नहीं छिन पाई। हालांकि सरकार ने सभी राजनीतिक नियुक्तियां कैंसिल कर दी थी।