जम्मू-कश्मीर में निजी ट्रांसपोर्ट पर निर्भर है ट्रैफिक व्यवस्था, पहाड़ी क्षेत्रों में दौड़ रहे खटारा वाहन

राजेन्द्र भगत 

जम्मू,  जम्मू कश्मीर में बिगड़ी ट्रैफिक व्यवस्था को पटरी लाने के लिए आज तक राज्य सरकार ने कोई पहल नहीं की। राजनीतिक दलों के लिए भी कभी यह मुद्दा नहीं रहा। अगर किसी अधिकारी ने आकर कभी ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सुधार के लिए प्रयास किया होगा तो उसे अधिक देर तक कुर्सी पर नहीं रहने दिया गया। यही वजह है कि सवा करोड़ की जनसंख्या वाले जम्मू कश्मीर में ट्रैफिक की समस्या सुधरने के बजाय बिगड़ती जा रही है। शहरों में जहां अधिक वाहन होने के कारण जाम की समस्या लगी रहती है, वहीं दूरदराज के क्षेत्रों में गाडिय़ों की कमी के कारण खस्ताहाल बसें व मिनी बसों पर ही यात्री बैठने के लिए विवश हो जाते हैं। हालांकि, राज्यपाल प्रशासन ने अभी ट्रैफिक व्यवस्था में सुधार के लिए कदम उठाने की घोषणा तो की है। लेकिन इनके अभी जमीनी स्तर पर परिणाम नजर नहीं आ रहे हैं।जम्मू-कश्मीर की ट्रैफिक व्यवस्था पूरी तरह से निजी ट्रांसपोर्ट पर ही निर्भर है। राज्य में दस हजार से अधिक मिनी बसें चलती हैं तो बसों की संख्या भी हजारों में है। सिर्फ जम्मू शहर में ही साढ़े तीन हजार से अधिक मिनी बसें दौड़ती हैं। यही पूरे सिस्टम पर हावी हैं। पहले जम्मू शहर राज्य सेवा पथ परिवहन निगम की बसें चलती थी। इतना ही नहीं दूरदराज के क्षेत्रों में निगम की बसें चलती थी। डबल डेकर बस सेवा भी निगम ने जम्मू से आरएसपुरा तक चलाई थी। मगर धीरे-धीरे सभी बंद हो गई। शहर व दूरदराज के क्षेत्रों में निगम ने अपनी गाडिय़ां चलाना ही बंद कर दी। इससे निजी बस चालकों और मिनी बस चालकों की हर जगह मनमानी भी देखने को मिलती है। कई जगहों पर तो यात्रियों से किराया तक अधिक वसूला जाता है। मगर इस पर कोई भी नहीं बोलता। यही नहीं मिनी बसों के चलने का भी कोई समय नहीं है। यात्रियों को उठाने के चक्कर में उनमें होड़ लगी रहती है। इससे कई बार हादसे भी होते हैं। ट्रैफिक समस्या के कारण राज्य के पहाड़ी क्षेत्रों क्षेत्रों में आए दिन हादसे हो रहे हैं। इस बात से भलीभांति हमारे राजनीति दल अवगत है। इसके बावजूद किसी भी राजनीति दल अपने चुनावी मुद्दों में ट्रैफिक समस्या को शामल नहीं करते हैं । इसी का नतीजा है कि राज्य में हर दिन कोई न कोई हादसा होते रहता है।राज्य में नियमों के अनुसार पंद्रह साल तक चली गाड़ी को सड़कों पर नहीं चलाया जा सकता है। मगर दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में ऐसी ही बसें दौड़ती नजर आती हैं। जिन बसों को जम्मू शहर के रूटों में नकार दिया जाता है, उन्हें ट्रांसपोर्टर पहाड़ी क्षेत्रों में भेज देते हैं। इस कारण इन क्षेत्रों में सड़क हादसे भी अधिक होते हैं। बसों, मिनी बसों सभी का यही हाल है। ट्रांसपोर्टरों का हालांकि इस पर तर्क यह है कि दूरदराज के पहाड़ी क्षेत्रों में कच्ची सड़कें होने के कारण वहां पर नई बसें चलाना मुश्किल है। अगर वहां पर नई बसें चलाई जाएं तो उनके लिए किस्त पूरी करना भी मुश्किल हो जाएगा। हैरानगी की बात तो यह है कि इन क्षेत्रों में सरकारी बसें भी नहीं चलाई जाती हैं।

राज्य में ट्रांसपोर्ट व्यवस्था में सुधार न होने का एक कारण यहां पर ट्रांसपोर्ट इंडस्ट्री पर प्रभावशाली लोगों का कब्जा होना भी हे। कई लोग विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े हुए हैं। ऐसे में उन्हें इस बात की जरा भी परवाह नहीं है कि लोगों को सुविधा मिल रही है या नहीं। इससे उन्हें कोई लेना देना नहीं है।

यह उम्मीद बनी : जम्मू-कश्मीर राज्य पथ परिवहन निगम राज्य में इलेक्ट्रिक बस सेवा शुरू करने जा रहा है। इसके लिए टाटा मोटर्स को 40 बसें बनाने का आर्डर दिया है। अप्रैल महीने के अंत तक इलेक्ट्रिक बसें आने की उम्मीद है। 20 बस जम्मू शहर और 20 बस श्रीनगर शहर के विभिन्न रूट पर दौड़ेंगी। एक इलेक्ट्रिक बस की कीमत एक करोड़ के करीब है। इन बसों के शुरू होने से मिनी बसों पर अंकुश लगने की उम्मीद है।