जम्‍मू-कश्‍मीर के किश्तवाड़ हत्या- मतदान से दूर रखने की आतंकी साजिश का है हिस्सा

राजेन्द्र भगत 

जम्मू, : किश्तवाड़ में मंगलवार को आतंकियों द्वारा दिनदहाड़े आरएसएस कार्यकर्ता चंद्रकांत व उनके अंगरक्षक की हत्या बड़ी साजिश की तरफ इशारा कर रही है। इस हत्या के बाद न सिर्फ किश्तवाड़ में बल्कि जम्मू संभाग के अन्य हिस्सों में भी तनाव देखा गया लेकिन स्थानीय लोगों के संयम और प्रशासनिक कार्य कुशलता के चलते यह हत्याकांड सांप्रदायिक हिंसा में नहीं बदला।

छह माह से भी कम समय में सांप्रदायिक और आतंकवाद की दृष्टि से संवेदनशील जम्मू क्षेत्र के इस जिले में भाजपा और आरएसएस से जुड़े नेता की हत्या का यह दूसरा मामला है। इसलिए इसे महज एक आतंकी वारदात कहकर खारिज नहीं किया जा सकता। सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठाती यह घटना पूरी रियासत को सांप्रदायिक आग में धकेलने, चिनाब क्षेत्र में फिर से जिहादी तत्वों की पौध तैयार करने और क्षेत्र के अल्पसंख्यक समुदाय को डरा-धमका उसे खदेडऩे की एक बड़ी साजिश का हिस्सा नजर आती है।

यहां यह बताना असंगत नहीं होगा कि करीब पांच माह पहले पहली नवंबर की रात को आतंकियों ने भाजपा के तत्कालीन राज्य सचिव अनिल परिहार की उनके भाई अजीत परिहार संग गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस हत्याकांड की जांच एनआइए कर रही है लेकिन यह जांच कहां पहुंची, किसी को नहीं पता।

अलबत्ता, परिहार बंधुओं की हत्या के आरोप में दक्षिण कश्मीर के दो लोगों के अलावा किश्तवाड़ के रहने वाले एक हरकत उल जेहादे इस्लामी के पूर्व आतंकी इरशाद अहमद कंट को गिरफ्तार किया। इरशाद के घर से एसाल्ट राइफल के एक दर्जन कारतूस भी मिले थे। इसके अलावा जफर हुसैन नामक एक व्यक्ति भी पकड़ा गया। आरोप था कि आतंकियों ने उसकी गाड़ी का इस्तेमाल किया। इससे अधिक जानकारी किसी के पास नहीं है।

किश्तवाड़ में पांच माह के दौरान यह दो राजनीतिक हत्याएं क्षेत्र को फिर से आतंकवाद और पूरी रियासत को सांप्रदायिक हिंसा की की भटठी में सुलगाने की सुनियोजित साजिश का ही हिस्सा हैं। चंद्रकांत और उनके अंगरक्षक की हत्या का समय भी इसी साजिश की तरफ संकेत करता है। करीब आठ दिन बाद इस क्षेत्र में मतदान होना है। जम्मू क्षेत्र में बृहस्पतिवार को वोट पड़ेंगे। ऐसे में मुस्लिम बहुल इस इलाके में यह हत्या अल्पसंख्यक समुदाय में डर पैदा कर, उसे मतदान से दूर रखने की आतंकी साजिश का हिस्सा है। चुनावों के मद्देनजर सुरक्षा दावों और सक्रिय आतंकियों के पोस्टरों के बीच इस हत्या ने साबित कर दिया कि आतंकी फिर से इस इलाके में सुरक्षित ठिकाने बना चुके हैं।

यह इलाका शुरु से ही अलगाववादी तत्वों का निशाना रहा है। कश्मीर के हालात का इस पर सीधा असर रहता है। हरकत उल जेहाद ए इस्लामी, मुस्लिम जांबाज फोर्स, लश्कर और हिज्ब के आतंकियों का एक बड़ा कैडर इस क्षेत्र से रहा है। लेकिन वर्ष 2005 के बाद इस क्षेत्र में आतंकी गतिविधियां लगभग नाम मात्र रह गईं और आतंकियों की संख्या भी एक दर्जन से नीचे रह गई थी। इस पूरे क्षेत्र को सुरक्षाबलों ने ग्रीन जोन अथवा आतंकवाद से मुक्त क्षेत्र मानना शुरु कर दिया था।

खास तत्वों को बना रहे निशाना

क्षेत्र में सबकुछ सही नहीं है और इसका संकेत वर्ष 2013 को ईद के दौरान हुए सांप्रदायिक दंगों ने साफ कर दिया कि यहां जिहादी तत्व फिर से सक्रिय हो चुके हैं। ऐसे में सवाल उठे कि यह तत्व उन लोगों को निशाना बनाएंगे जिनके कारण पूरे डोडा क्षेत्र (बनिहाल से लेकर किश्तवाड़ की हिमाचल प्रदेश की साथ लगी सीमा तक) में अपने मंसूबों को अंजाम नहीं दे पाए थे। इनमें मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग के अलावा आरएसएस से जुड़े लोग ही हैं। क्षेत्र में तीन दशक के दौरान आरएसएस से जुड़े लोगों की हत्याएं इसकी पुष्टि करती है।