अयोध्या: बालाकोट के शोर में दबी राम मंदिर की आवाजें

राम मंदिर आंदोलन शुरू होने के बाद से अब तक यह पहला आम चुनाव है जब अयोध्या में राम मंदिर की कोई गूंज नहीं सुनने में आई है। हालांकि भाजपा ने अपने घोषणा पत्र में राम मंदिर को रखा है लेकिन बालाकोट हमले ने चुनावी प्रचार में राम मंदिर के मुद्दे को पीछे छोड़ दिया है। हर ओर इसी की गूंज सुनाई दे रही है। अयोध्या नगर फैजाबाद लोकसभा सीट का हिस्सा है। यहां 6 मई को चुनाव होना है।

राम मंदिर का मुद्दा किस तरह से गौण हो गया है उसका अनुमान लगाया जा सकता है कि रामनवमी की पूर्व संध्या पर भी यहां कहीं से राम का नाम नहीं सुनाई दे रहा था। वरना हर बार मंदिर वहीं बनाएंगे का नारा जरूर लगता था। अयोध्या का मूड ही इस बार कुछ और है। एक साल पहले राम राज्य रथ को झंडा दिखाया गया था लेकिन अब यह भी थम चुका है। चंद समर्थक ही नजर आए इसके आसपास। अवध विवि के सेवा निवृत्त प्रोफेसर राम शंकर त्रिपाठी कहते हैं कि पीएम नरेंद्र मोदी के लिए बालाकोट ज्यादा संवेदनशील मसला है।

अयोध्या के वर्तमान भाजपा सांसद व प्रत्याशी लल्लू सिंह कहते हैं कि मंदिर नहीं राष्ट्रवाद मुद्दा है। हम तो मोदी के नाम पर जीतेंगे। हमने कभी राम मंदिर के नाम पर वोट नहीं मांगा। मैं मोदी की अपील पर जीतूंगा। बरसों से कारसेवकपुरम में काम चल रहा है मंदिर के पत्थरों को तराशने का। यहां पर गुजराती आर्टिस्ट काम में लगे रहते हैं। लाखों की संख्या में यहां ईंटे रखी हैं जिन पर जय श्रीराम लिखा हुआ है। विश्व हिंदू परिषद के केंद्रिय सचिव राजेंद्र पंकज कहते हैं राष्ट्रवाद ही राम है। ये दोनों एक दूसरे से भीतर तक जुड़े हुए हैं। वे भी मानते हैं कि यह चुनावी मुद्दा नहीं है। वैसे यह बात दीगर है कि 1989 के बाद से देश के किसी प्रधानमंत्री ने अयोध्या का दौरा नहीं किया है। अंतिम बार स्व. राजीव गांधी यहां आए थे। उन्होंने यहां से चुनाव अभियान की शुरूआत की थी और कांग्रेस सत्ता से बाहर चली गई थी। वी पी सिंह पीएम बने थे। स्थानीय लोगों का मानना है कि पीएम नरेंद्र मोदी को भी यहां जरूर आना चाहिए।

फैजाबाद से दो बार सांसद रहे विनय कटियार, जो भाजपा के नेता भी रहे और राम मंदिर आंदोलन से सक्रिय जुड़े रहे, कहते हैं-मुझे भाजपा प्रत्याशी के लिए प्रचार को नहीं कहा गया है। यहां जीत आसान नहीं होगी। बाबरी मस्जिद मामले से सक्रियता से जुड़े हुए इकबाल अंसारी कहते हैं कि रामलला मंदिर पहले से ही विवादित स्थल पर बना हुआ है। रोजाना 5 हजार लोग कम से कम पूजा करते हैं। यह बीजेपी के लिए चुनावी मुद्दा क्यों होना चाहिए। वैसे इस बार भाजपा के लिए यहां पर दलित-मुस्लिम-ओबीसी समीकरण भारी पड़ते नजर आ रहे हैं। सपा के प्रत्याशी आनंद सेन, यहां से तीन बार सांसद रहे मित्रसेन यादव के बेटे, को गठबंधन का प्रत्याशी होने का लाभ मिलना तय है और उन्हें भरोसा है कि 6 मई को जब मतदान होगा तो वे विजेता निकलेंगे। उनका कहना है कि योगी आदित्यनाथ का हश्र यहां वैसा ही होगा जैसा गोरखपुर सीट पर हुआ था।