सीमा की रक्षा करने के साथ तनोट माता मंदिर में आरती भी करते है बीएसएफ के जवान

गर्वित श्रीवास्तव 

जोधपुर. सीमावर्ती जैसलमेर जिले में पाकिस्तान बॉर्डर के समीप स्थित तनोट माता के मंदिर में इन दिनों चल रहे नवरात्रा में बड़ी संख्या में श्रद्धालू पहुंच रहे है। यहां मेले जैसा माहौल है। तनोट माता भारतीय सीमा सुरक्षा बल की आराध्य देवी हैं। रखरखाव व आरती से लेकर मंदिर की सम्पूर्ण जिम्मेदारी बीएसएफ के जवान संभालते है। बीएसएफ के जवानों को आरती करते देख अलग ही अनुभूति होती है। इन जवानों के साथ श्रद्धालू में झूमते हुए आरती गाना शुरू कर देते है।

इस मंदिर का इतिहास बहुत समृद्ध है। मान्यता है कि ये माताजी बलूचिस्तान स्थित माता हिंगलाज का ही रूप हैं। यहां देवी के दर्शन करने से भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं। यह मंदिर सीमा सुरक्षा बल के अधिकारियों और जवानों के साथ देश प्रदेश के हजारों लोगों के लिए आस्था का केंद्र बना हुआ है। यह राज्य का पहला मंदिर है, जिसमें सभी व्यवस्थाएं बीएसएफ के जिम्मे हैं।

क्या है मंदिर का इतिहास
इस मंदिर परिसर में लगे शिलालेख के अनुसार जैसलमेर क्षेत्र के निवासी मामडियांजी की पहली संतान के रूप में विक्रम संवत् 808 चैत्र सुदी नवमी तिथि मंगलवार को भगवतीश्री आवड़देवी यानी तनोट माता का जन्म हुआ था।
माता की 6 बहनें आशी, सेसी, गेहली, होल, रूप और लांग थीं। देवी मां ने जन्म के बाद क्षेत्र में बहुत से चमत्कार दिखाए और लोगों का कल्याण किया। इस क्षेत्र में राजा भाटी तनुरावजी ने वि.सं. 847 में तनोट गढ़ की नींव रखी थी। इसके बाद यहां देवी मां का मंदिर बनवाया गया और वे तनोट राय माता के नाम से प्रसिद्ध हुईं।

जैसलमेर और इसके आसपास के लोगों के मन में देवी मां के लिए गहरी आस्था है। तनोट राय माता मंदिर में हर साल दो बार नवरात्र के दौरान मेला लगता है। इसके अलावा रोज सुबह शाम मंदिर में विधि पूर्वक आरती होती है। यहां बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचते हैं। मंदिर की साफ सफाई के अलावा मंदिर में होने वाली तीन समय की आरती बीएसएफ के जवान ही करते हैं। मातेश्वरी तनोट राय मंदिर में प्रतिदि न सीमा सुरक्षा बल के जवानों द्वारा की जाने वाली आरती में भक्ति भावना के साथ जोश का अनूठा रंग नजर आता है।

रुमाल बांधते है भक्त
क्षेत्र में प्रचलित मान्यता के अनुसार यहां आने वाले सभी भक्तों की मन्नतें देवी मां पूरी करती हैं। भक्त मन्नत मांगकर एक रुमाल में कुछ रुपए बांधते हैं और रुमाल यहां रख जाते हैं। इसके बाद जब मन्नत पूरी हो जाती है तो भक्त देवी दर्शन के लिए आते हैं और रुमाल में रखे रुपए यहां चढ़ा देते हैं।

1965 में यहां हुआ था चमत्कार
वर्ष 1965 में भारत और पाकिस्तान का युद्ध हुआ था। युद्ध में पाकिस्तानी सेना की ओर से माता मंदिर के क्षेत्र में करीब सैकड़ों बम गिराए थे, लेकिन मंदिर को कोई नुकसान नहीं हुआ। मंदिर की इमारत वैसी की वैसी रही। तनोट माता मंदिर परिसर में अभी भी पाकिस्तानी के कई बम आम लोगों के देखने के लिए रखे हुए हैं। ये सभी बम उस समय फटे ही नहीं थे। भारतीय सेना और यहां के लोग इसे देवी मां का ही चमत्कार मानते हैं।

पाकिस्तानी ब्रिगेडियर भी हुए नतमस्तक

वर्ष 1965 के युद्ध के दौरान माता के चमत्कारों के आगे नतमस्तक हुए पाकिस्तानी ब्रिगेडियर शाहनवाज खान ने भारत सरकार से यहां दर्शन करने की अनुमति देने का अनुरोध किया था। करीब ढाई साल की जद्दोजहद के बार भारत सरकार से अनुमति मिलने पर ब्रिगेडियर खान ने न केवल माता की प्रतिमा के दर्शन किए, बल्कि मंदिर में चांदी का एक छत्र भी चढ़ाया जो आज भी मंदिर में है और इस घटना का गवाह है।

यहां है विजय स्तंभ भी
देवी मां के मंदिर का रख-रखाव भारतीय सीमा सुरक्षा बल ही करती है। यहां भारत-पाकिस्तान युद्ध की याद में एक विजय स्तंभ का भी निर्माण किया गया है। ये स्तंभ भारतीय सेनिकों की वीरता की याद दिलाता है।