सात समंदर पार चुनावी नतीजों का इंतजार

दुनिया के सबसे बड़े लोकतंत्र में चुनाव हों और विदेश में बैठे भारतीय चुप बैठें यह कैसे हो सकता है? लोकसभा चुनावों को लेकर देश से बाहर रह रहे भारतीय समुदाय में भी बराबर का उत्साह है। यह उत्साह वहां होने वाली पार्टियों और समर्थन रैलियों से सहज आंका जा सकता है।

कांग्रेस, भाजपा और यहां तक कि क्षेत्रीय पार्टियों के उम्मीदवारों के समर्थन में विदेशों में कार्यक्रम हो रहे हैं। ऑस्ट्रेलिया, अमरीका और जर्मनी में तो अनिवासी भारतीय बाकायदा सार्वजनिक रूप से चुनावी रैलियां कर रहे हैं। हालांकि इनका स्वरूप भारतीय रैलियों से अलग हटकर फ्लैश डांस जैसे इवैंट्स के रूप में है लेकिन दो दिन पहले कनाडा में सुखपाल खैहरा के समर्थन में हुई रैली साफ बता रही थी कि सात समंदर पार भी चुनावी नतीजों का बेसब्री से इंतजार है। तो आज बात एन.आर.आई. वोटर्स की।

किसी भी उम्मीदवार की बदल सकते हैं किस्मत 
एन.आर.आई. की यह संख्या इतनी ज्यादा है कि अगर उन्हें लोकसभा की 543 सीटों में बांटा जाए तो औसत आता है 23,955 वोट। इस लिहाज से वे किसी भी उम्मीदवार की किस्मत बदल सकते हैं। हालांकि यह अलग बात है कि पंजीकृत होने के बावजूद एन.आर.आई. वोटिंग में ज्यादा रुचि नहीं रखते। पिछले चुनाव में13,039 एन.आर.आई. मतदाता पंजीकृत थे लेकिन सिर्फ 8 ने मताधिकार का प्रयोग किया था। इनमें से 4 ने गुजरात में, 2 ने चंडीगढ़ तथा राजस्थान और पश्चिम बंगाल में एक-एक एन.आर.आई. मतदाता ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया था। इस बार 71,735 एन.आर.आई. ने बतौर वोटर खुद को रजिस्टर कराया है। इनमें से 92 प्रतिशत केरल के निवासी हैं। केरल के 66,584 रजिस्टर्ड वोटर्स में से 3729 महिलाएं हैं जबकि 8 थर्ड जैंडर लोगों ने भी खुद को रजिस्टर कराया है। दिलचस्प ढंग से 2014 में भी केरल से ही सबसे ज्यादा 12,653 एन.आर.आई. वोटर थे लेकिन उनमें से एक ने भी वोट नहीं डाला था।

इसलिए आया प्रॉक्सी वोटिंग कानून 
एन.आर.आई. की कम वोटिंग से पार्टियां चिंतित हैं। एन.आर.आई. को मोटे पैसे खर्च कर भारत आकर मतदान करना पड़ता है। ऐसे में भाजपा ने 2017 में प्रॉक्सी वोटिंग का कानून बनाने की कोशिश की। इसके तहत एन.आर.आई. भारत में बैठे अपने किसी रिश्तेदार को अपना वोट डालने के लिए अधिकृत कर सकते थे। ऑनलाइन वोटिंग की भी चर्चा उस दौरान हुई। लोकसभा में पास होने के बावजूद बिल राज्यसभा में अटक गया। हालांकि यह बताना भी जरूरी है कि एन.आर.आई. को वोट डालने का हक 2011 में कांग्रेस नीत यू.पी.ए. सरकार ने दिया था। उस समय जनप्रतिनिधित्व कानून में इसके लिए संशोधन किया गया था।

विदेशों में 3 करोड़ भारतीय 
विदेश मंत्रालय के डाटा के अनुसार इस समय विदेशों में 3 करोड़ 8 लाख 43 हजार 419 भारतीय रह रहे हैं। इनमें से 1 करोड़  30 लाख 8 हजार 12 एन.आर.आई. हैं जबकि 1 करोड़ 78 लाख 35 हजार 407 पी.आई.ओ. हैं। पी.आई.ओ. और एन.आर.आई. सामान्यत:एक ही माने जाते हैं लेकिन बेसिक फर्क यह है कि एन.आर.आई. को भारत में वोटिंग का हकहै और पी.आई.ओ. को नहीं। पी.आई.ओ. वे भारतीय हैं जो विदेशों में बस गए हैं लेकिन जिनकी जड़ें भारत में हैं। एन.आर.आई. उन्हें कहा जाता है जिनके परिवार भारत में ही हैं और काम-धंधे के लिए वे भारत से बाहर हैं। यह मोटा-सा फार्मूला है। सिर्फ  वे एन.आर.आई. ही मतदाता बन सकते हैं जिन्होंने विदेशी नागरिकता नहीं ली है। अनिवासी भारतीयों के पासपोर्ट पर उनके निवास का जो पता लिखा है उसी के आधार पर संबंधित लोकसभा या विधानसभा सीट की निर्वाचक सूची में उसका नाम दर्ज होता है। निर्वाचक सूची में नाम दर्ज करवाने के बाद अनिवासी भारतीय जिस निर्वाचन क्षेत्र में मतदाता के रूप में पंजीकृत हैं वहां मतदान केंद्र पर पहुंचकर मतदान कर सकते हैं।

प्रमुख देशों में एन.आर.आई. जनसंख्या (पंजीकृत वोटर्स)
सऊदी अरब      17.89 लाख
यू.ए.ई.            17.50 लाख
ब्रिटेन              15.00 लाख
अमरीका            9.27 लाख
ओमान              7.18 लाख
कुवैत                5.79 लाख
कतर                5.00 लाख
बहरीन                3.5 लाख
सिंगापुर              3.5 लाख
आस्ट्रेलिया        2.13 लाख
कनाडा              2.20 लाख

कुल पंजीकृत एन.आर.आई. वोटर्स 
देश में          71,735
केरल           66,584
आंध्र प्रदेश       2511
तेलंगाना         1127
पुड्डुचेरी            231
पंजाब              393
दिल्ली               42
गुजरात             14
हिमाचल            02