पत्नी के तीरथ के सपने को बाइक से किया साकार

इंदौर। यात्रा तो बहुत लोग करते हैं। कोई पर्यटन स्थल पर जाता है तो कोई तीर्थस्थल, लेकिन कुछ लोग जुनूनी होते हैं, जो यात्रा अपने तरीके से करते हैं। उनका तरीका अनोखा होता है और वे भीड़ में रहते हुए भी अलग दिखाई देते है। ऐसे ही एक शख्स हैं द्वारकापुरी निवासी मदनलाल विनायक शर्मा, उम्र 49 वर्ष, लेकिन हौसला 20 वर्ष के युवा की तरह। उनकी पत्नी सुषमादेवी ने उनसे कह दिया था कि बस, ट्रेन में मैं यात्रा नहीं कर सकती।

इसके बाद उन्होंने हमेशा पत्नी को मोटरसाइकिल से ही रिश्तेदारी, शादी-ब्याह, आसपास के धार्मिक स्थलों पर यात्रा कराई। यहां तक तो ठीक था, लेकिन जब पत्नी ने वैष्णोदेवी जाने की बात कही तो, मदनलाल उन्हें बाइक से लेकर निकल पड़े वैष्णोदेवी के लिए। इसके बाद उनका हौसला मजबूत हो गया। इस वर्ष उनकी पत्नी के मन में चार धाम (उत्तराखंड) यात्रा का विचार आया। मदनलालजी को उन्होंने बताया तो फिर क्या था वे सहर्ष तयार हो गए। बाइक नहीं थी तो अपने साढू की बाइक मांग ली और चल पड़े चार धाम की ओर…

मदनलाल ने बताया कि पहले दिन इंदौर से यात्रा शुरू कर 536 किलोमीटर दूर ग्वालियर पहुंचे। इसके बाद दूसरे दिन 455 किलोमीटर की यात्रा कर हरिद्वार पहुंचे। यहां से अगले दिन मसूरी, बड़कोट होते हुए करीब 279 किलोमीटर का सफर कर पहुंच गए जानकी चट्टी। यमनोत्री समुद्र तल से 3235 फीट ही ऊंचाई पर है। जानकी चट्टी से घोड़ों से यमुनोत्री पहुंचे। अगले दिन यमुनोत्री के दर्शन करने के उपरांत सुबह 11 बजे यात्रा शुरू की और उत्तरकाशी होते हुए गंगोत्री से मात्र 54 किलोमीटर पहले गंगनानी में रुके। एक समय था जब यात्री गंगोत्री की यात्रा गंगनानी तक ही करते थे।

इसके बाद मार्ग बहुत कठिन था, हालांकि अब गंगोत्री के ऊपर भी पहाड़ों में मां गंगा के उद्गम स्थल गोमुख के दर्शन करने श्रद्धालु घोड़ों से जाने लगे हैं। शर्मा ने बताया कि हम गंगोत्री सुबह 8 बजे पहुंचे और करीब 11.30 बजे प्रस्थान किया। फिर निकल पड़े केदार धाम की ओर । उत्तरकाशी, चौरंगी होते हुए चमोलिया पहुंचे, वहां (5वीं रात ) पड़ाव किया। छठे दिन सुबह 5.30 बजे पुनः यात्रा शुरू की। गुप्तकाशी होते हुए दोपहर 2 बजे सोनप्रयाग पहुंचे। उत्तराखंड में सोनप्रयाग से आगे स्वयं के वाहन से जाने नहीं दिया जाता। अतः सोनप्रयाग में बाइक छोड़ी और वहां से लोकल वाहन से गौरीकुंड पहुंचे। गौरीकुंड में तेज बारिश के कारण पुलिस प्रशासन ने यात्रा रोक दी, इसीलिए करीब 12 घंटे यहां ही ठहरे। बारिश थमने पर रात्रि 2 बजे घोड़ों से यात्रा शुरू की और सुबह केदारनाथ पहुंचे।

उन्होंने बताया कि केदारनाथ के दर्शन कर बद्रीनाथ की ओर रवाना हुए। दोपहर बाद तीन बजे सोनप्रयाग से बाइक लेकर यात्रा आरंभ की। सातवीं रात ऊखी मठ के भारत सेवा आश्रम में बिताई। अगले दिन यहां दर्शन-वंदन कर चोपता, चमोली, जोशी मठ होते हुए शाम पांच बजे बद्रीनाथ पहुंच गए। नौवें दिन सुबह देश के अंतिम छोर पर स्थित माना गांव पहुंचे। नौवीं रात देवप्रयाग में बिताई और वहां गंगा और अलकनंदा संगम में स्नान किया और 11 बजे वहां से विदा ली। वहां से अलीगढ़, मथुरा, आगरा, ग्वालियर, गुना, शाजापुर, उज्जैन होते हुए इंदौर आए। 13 जून की सुबह शरू हुई यह यात्रा 24 जून को पूरी हो गई। कुल 3373 किमी की यात्रा बाइक से तय की।

खट्टे-मीठे अनुभव से सजी यात्रा

मदनलाल बताते हैं कि उन्हें यात्रा की प्रेरणा पत्नी से मिली। इस यात्रा के अनुभव भी बहुत ही रोमांचित एवं खट्टे-मीठे रहे। उत्तराखंड में जितने भी लोग मिले, काफी मिलनसार एवं सहयोगी थे। हमारी यात्रा सुबह 5 बजे से शुरू होकर शाम 6 बजे या रात 8 बजे तक 12-14 घंटे की रहती थी। इसमें हम लोग रास्ते में दिन में एक वक्त केवल रात के समय ही भोजन करते थे।