इन्दौर — निजी विद्यालय कर रहे शोषण

ब्यूरो चीफ
राजू मौर्य के साथ
रिपोर्ट कुशमेन्द्र सिंह
रीवा
निजी विद्यालयों जवा द्वारा, एक ही दुकान चिन्हित करने पर बुक्स और ड्रेस लेने से को मजबूर अभिभावक।

अभिभावकों का आरोप बुक सेलर और ड्रेस सप्लायर  मनमानी तरीके से लूटते  है अभिभावकों।

एनसीईआरटी की पुस्तकें नहीं मान्य होती निजी विद्यालयों में।

लूट का अड्डा बने जवा की सभी निजी विद्यालय ।

             जवा / जवा तहसील और त्योंथर तहसील में संचालित सीबीएससी पैटर्न/गैर सीबीएससी पैटर्न मध्यप्रदेश शासन से मान्यता प्राप्त निजी विद्यालयों ने प्राइवेट राइटर की बुक को ज्यादा अहमियत देते हुए जवा और त्योंथर तहसील में एक दुकान से सांठगांठ कर किताबे वहीं से दी जा रही है दूसरी जगह बच्चों को किताबें नहीं मिल रही। वही एनसीईआरटी की किताबें को भी कोई महत्व नही होता निजी विद्यालयों में।  इतना ही नहीं दुकान संचालक किताबों की मनमानी दाम वसूल रहे हैं । जिसमे आए दिन दुकान संचालकों से और अभिभावकों के बीच में विवाद की स्थिति बन जाती है  स्कूलों में बकायदा अभिभावकों को दुकानों के नाम और पते बताए जाते हैं साथ ही किताबों की सूची भी सौंपी जाती है। दुकान संचालक और प्राइवेट पब्लिकेशन सांठगांठ कर किताबों में मनमानी रेट डलवा कर किताबों की बिक्री करते है  जो रेट डाला जाता वह चार गुना ज्यादा रहता हैं। इतना हि नहीं दुकान संचालक सभी किताब एक साथ देते हैं यदि एक दो बुक्स लेना हो तो बुक्स नही मिलती।  इस कारण मजबूरन अभिभावक को  सभी किताबे लेना पड़ता है।
यह कहना गलत नही होगा कि इस गोरख धंधे में प्रशासन का भी सहयोग होता है

शिक्षण सत्र शुरू होते ही निजी विद्यालयों और दुकान संचालकों के बीच किताबों की बिक्री को लेकर समझौता हो जाता है और मनमानी तरीके से कीमत बढ़ा कर पुस्तकें बेची जाती हैं। जिले भर में करोड़ों रुपए का व्यवसाय हो जाता है जिसका कोई लेखा-जोखा नहीं होता है  जब कोई अभिभावक पक्का बिल मांगता है तो समय ना होने या भीड़ का बहाना बनाकर उन्हें रसीद नहीं दी जाती  इतना ही नहीं आयकर विभाग को भी जो बिल प्रस्तुत किए जाते हैं उसमें और बिक्री में अंतर रहता है।
मन माफिक एमआरपी रेट पर बेची जाती है पुस्तकें। छूट का नहीं रहता कोई नामोनिशान।
विद्यालय संचालकों द्वारा मोटी कमीशन लेने के कारण दुकान संचालक एमआरपी रेट पर पुस्तके बेचते हैं एक भी रुपए की छूट नहीं देते है जबकि दुसरो दुकानदारों का कहना है जो प्राइवेट राइटर की किताबें होती है उसमें 60 % तक  मार्जिन होता है  यहा तक की कापियों में भी काफी मार्जिन होता है लेकिन जवा और त्योंथर में कभी छूट नही दी जाती है सवाल यह है कि जब एमआरपी रेट पर पुस्तके बिक रही है तो जीएसटी कैसे जोड़ा जाता है। और बिल में कैसे सम्मिलित किया जाता है।
निजी विद्यालयों के आगे सरकारें भी हो जाती है बेबस।
निजी विद्यालयों के दबाव में सरकारे भी झुक जाती हैं कहने को तो रहता है कि सरकार गरीब बच्चों को बेहतर शिक्षा देने के हर संभव प्रयास करती है लेकिन जमीनी हकीकत यह रहती है कि उन्हें ध्यान देने वाला कोई नहीं रहता। प्रदेश में शिक्षा का अधिकार कानून लागू है जिस में गरीब बच्चों को प्रवेश दिया जाता है किसी तरह निजी विद्यालयों में प्रवेश तो मिल जाता है लेकिन जब किताब और ड्रेस की सूची उन्हें सौंप दी जाती है तो उनके पसीने छूट जाते हैं। यदि फीस देने के लिए ही होता तो शिक्षा अधिकार कानून के तहत बच्चो प्रवेश क्यों दिलवाते।  5-7 हजार रुपए की किताबों की जब सूची जब निजी विद्यालय के संचालक द्वारा सौंप दी जाती है तब अभिभावको के पसीने छूट जाते हैं लेकिन शासन प्रशासन आंख मूद कर बैठे रहते है कारण की उन्हें भी निजी विद्यालयों से हिस्सा मिल जाता होगा।
निजी विद्यालयों में शोषण का शिकार हो रहे अभिभावकों की जिम्मेदारी किसकी।
क्या इन विद्यालयो के शोषण पर शासन प्रशासन / संसद / विधायको  की कोई जिम्मेदारी नही होती  जो गहरी नींद में सोए रहते है।
आखिर कब तक शोषित होते रहेंगे निजी विद्यालयों के अविभावक।