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धर्म

धर्म (13)

भारतीय संस्कृति और चिंतन परम्परा में गौ को अत्यधिक पूजनीय माना गया है। जो गौओं को पालते हैं, उनकी रक्षा करते हैं गौधन उन गृहस्थों के ऐश्वर्यों की वृद्धि करता है। इसलिए वेद में स्पष्ट उद्घोषणा की गई है कि गौ माता, पुत्री और बहन के समान अघ्न्या है। ऋग्वेद का मंत्र है-


माता रूद्राणां दुहिता वसूनां स्वसादित्यानाम् तस्यनाभि:। प्र नु वाचं चिकितुषे जनायमागामानागामदिति वधिष्ट।।


गौ राष्ट्र के रूद्र, वसु और आदित्य ब्रह्मचारियों की माता, पुत्री और बहन है। ये अमृत हैं। ऐसी निष्पाप गौ को कभी मत मार। इसलिए गौ को वेद में रक्षा करने योग्य बतलाया है।


इमं साहस्रं शतधारमुत्संव्यच्यमानं शरीरस्य मध्ये। घृतं दुहानामदितिं जनायाप्रे मा हिंसी: परमे व्योमन्।। यजु.


अर्थात सैंकड़ों तथा हजारों का धारण और पोषण करने वाली दूध का कुआं, मनुष्यों के लिए घृत देने वाली और जो न काटने योग्य गौ है उसकी हिंसा मत कर।


महर्षि दयानंद जी इसी मंत्र पर भावार्थ में लिखते हैं, ‘‘जिस गाय से दूध, घी आदि पदार्थ उत्पन्न होते हैं, जिनके द्वारा सभी का रक्षण होता है, ऐसी गौ कभी भी मारने योग्य नहीं है। जो गाय की हिंसा करे उसे राजा दंड दे।’’ 


वेद में सभी पशुओं की रक्षा के लिए कहा गया है। अथर्ववेद में कहा गया है कि क्षत्रिय ब्राह्मण की गौ की रक्षा करें, उसकी हिंसा कभी न करें। गौ अघ्न्या है। अत: गौ को कभी नहीं मारना चाहिए। निरुक्त में भी गौ के जो नाम दिए हैं वे हैं- अघ्न्या, उस्रा, उस्रिया, अही, मही, अदिति, जगती और शक्वरी। इन शब्दों में ‘अघ्न्या’ और ‘अदिति’ शब्द गौ के अवध्य होने की तथा ‘अही’ और ‘मही’ शब्द उसके पूज्य होने की सूचना देते हैं। 


इसी प्रकार वेद में अनेक स्थलों पर गौ को ‘अघ्न्या’ कहा है और जो उसकी रक्षा करता है उसकी प्रशंसा वेद द्वारा की गई है। मारूतं गोषु अघ्न्यं शर्ध: प्रशंस: अर्थात जो मारूत गौ की रक्षा करते हैं उनके बल की रक्षा करो। इयं अघन्या अश्विभ्यां पय: दुहाम् अर्थात यह अवध्य गौ अश्वि देवों के लिए दूध दे। अघ्न्ये विश्वदानीं तृणं अद्धि अर्थात हे अवध्य गौ तू सदा घास खा।


इसके अलावा और भी शास्त्रों के प्रमाण हैं जहां पर गाय को पूजा के योग्य बताया है। 
गावो विश्वस्य मातर: अर्थात गाय सारे संसार की माता है। 


वेद से अलग भारतीय साहित्य में भी गौ का महत्व बहुत दर्शाया गया है। जैसा कि महाभारत में- यज्ञांगं कथिता गवो यज्ञ एव च वासव:। एतामिश्च विना यज्ञो न वर्तेत कथंचन।।


भीष्म जी कहते हैं कि गौओं को यज्ञ का अंग तथा साक्षात् यज्ञस्वरूप कहा गया है क्योंकि इनके दुग्ध, दधि और घृत के बिना यज्ञ संपन्न नहीं होता। महाभारत में भी गौओं को अमृत की खान कहा है। वास्तव में गौ सर्वश्रेष्ठ पशु है, फिर भी मनुष्य पता नहीं उसकी हिंसा क्यों करता है। ये गौवें विकार रहित अमृत धारण करती हैं और दुहने पर अमृत रूपी दूध हमें प्रदान करती हैं। सारा संसार उनके सामने नतमस्तक होता है।


युग प्रवर्तक महर्षि दयानंद जी जो उन्नीसवीं शताब्दी के महान सुधारक हुए हैं वे गौओं के प्रति अपने उद्गार प्रकट करते हुए  ‘गोकरूणानिधि’ नामक ग्रंथ में गाय के आर्थिक दृष्टि से लाभ गिनाते हुए लिखते हैं, ‘‘इस गाय की पीढ़ी में छ: बछिया और सात बछड़े हुए इनमें से एक की रोग आदि से मृत्यु संभव है तो भी बारह शेष रह जाते हैं। उन बछियों के दूध मात्र से 154440 व्यक्तियों का पालन हो सकता है। अब रहे छ: बैल उनमें एक जोड़ी से 200 मन अन्न उत्पन्न हो सकता है। इस प्रकार तीन जोड़ी 600 मन अन्न उत्पन्न कर सकती है। प्रत्येक मनुष्य का तीन पाव भोजन गिने तो 256000 मनुष्यों को एक बार भोजन होता है। इन गायों को परपीढिय़ों का हिसाब लगाकर देखा जाए तो असंख्य मनुष्यों का पालन हो सकता है।


भारतीय इतिहास में आर्य राजाओं के यहां तो गौ रक्षा होती ही थी। इतिहास प्रसिद्ध रघुवंशी महाराजा दिलीप ने शेर के सामने गौ की रक्षा के लिए अपने आपको प्रस्तुत किया। तभी तो उस समय का भारत समस्त संसार का गुरु कहलाता था। मनु महाराज की यह घोषणा कि पृथ्वी के सभी मानव भारत में शिक्षा लेने आते थे। वह युग कितना सुंदर रहा होगा, इसका कारण गौ का सात्विक दूध और गौ रक्षा का ही फल था। 

माता बगलामुखी की जयंती पूरे भारतवर्ष में हर्षोल्लास के साथ मनाई जाती है और भक्तों द्वारा मां जगतजननी का जागरण व चौकी भी आयोजित की जाती है। माता बगलामुखी दस महाविद्याओं में से आठवीं महाविद्या हैं। माता के अलौकिक सौंदर्य और स्तंभन शक्ति के कारण इनका नाम बगलामुखी है बगला शब्द संस्कृत भाषा के वल्गा से है। मां बगलामुखी की पूजा-अर्चना और साधना मुख्य रूप से शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिए होती है।  कैसा भी कष्ट हो उसको माता बगलामुखी की साधना से तुरन्त नष्ट किया जा सकता है। माता बगलामुखी की पूजा करने वालों के पास कभी धन की कमी नहीं रहती। 


माता बगलामुखी शक्ति का साक्षात् स्वरूप हैं जो अपने भक्तों के दुखों और दुष्टों का विनाश करने के लिए प्रत्येक क्षण तैयार रहती हैं। मां बगलामुखी को पीले रंग से विशेष प्रेम है, जिसके कारण इनको मां पीताम्बरा भी कहा जाता है। माता बगलामुखी का रंग चमकते हुए स्वर्ण के समान है इसलिए माता की पूजा-अर्चना के लिए पीले रंग की सामग्री, फल-फूल आदि पीले रंग के ही होने चाहिएं और स्वयं साधक भी पीले रंग के वस्त्र धारण करे।  


बगलामुखी साधना की सिद्धि के लिए ‘वीर राजी’ विशेष महत्वपूर्ण है, सूर्य मकर राशिस्थ हो, मंगलवार को चतुर्दशी हो उसे ‘वीर राजी’ के नाम से जाना जाता है। शास्त्रों के अनुसार माता बगलामुखी ने इसी ‘राजी’ में रात्रि के समय प्रकट होकर विष्णु को इच्छित वर दिया और ब्रह्मा द्वारा रचित सृष्टि के विनाश को रोका। 


मां बगलामुखी की पूजा, अर्चना, साधना और सिद्धि के लिए प्रात: शीघ्र उठकर नित्यकर्म से निवृत होकर, पीले रंग के वस्त्र धारण करें, उसके बाद मंदिर या अपने घर में ही माता बगलामुखी का एक चित्र पूर्व दिशा या ईशान कोण में पीले रंग की गद्दी, कपड़े या चौकी पर स्थापित करें। तांबे की या चांदी की एक थाली पर चने की दाल से बगलामुखी का पूजन यंत्र बनाना चाहिए अथवा बना-बनाया यंत्र लाकर पूजा की जा सकती है। यंत्र बनाने के पश्चात यंत्र को नम: शिवाय के मंत्र से अभिमंत्रित करके पंचामृत, दूध या शहद, गंगाजल, चंदन आदि से स्थापित करना चाहिए। पूजा में पीले रंग के कनेर के फूलों का प्रयोग करना चाहिए। पीला वस्त्र, पीला आसन, पीले फूल, पीली सामग्री, पीले फल  आदि सब पीला ही होना चाहिए।  


सर्वप्रथम आचमन करें, पानी के छींटें चारों दिशाओं में छिड़कें। उसके पश्चात स्वस्तिवाचन कर धूप-दीप प्रज्ज्वलित करें। हाथ में कुछ अक्षत, पीले फूल और दक्षिणा लेकर संकल्प पढ़ें और संकल्प के पश्चात विनियोग पढ़ें :
अस्य: श्री ब्रह्मास्त्र-विद्या बगलामुख्या नारद ऋषये नम: शिरसि।
त्रिष्टुप् छन्दसे नमो मुखे। श्री बगलामुखी दैवतायै नमो ह्नदये।
ह्नीं बीजाय नमो गुह्ये। स्वाहा शक्तये नम: पाद्यो:।
ॐ नम: सर्वांगं श्री बगलामुखी देवता प्रसाद सिद्धयर्थ न्यासे विनियोग:।
विनियोग के पश्चात माता का आवाहन निम्न मंत्र से करें :
ॐ ऐं ह्नीं श्रीं बगलामुखी सर्वदृष्टानां मुखं स्तम्भिनि सकल 
मनोहारिणी अम्बिके इहागच्छ सन्निधि कुरू सर्वार्थ साधय साधय स्वाहा।
आवाहन के पश्चात् माता बगलामुखी के स्वरूप का ध्यान इस प्रकार करें :
सौवर्णमनसंस्थितां त्रिनयनां पीतांशुकोल्लसिनीम्।
हेमावांगरुचि शशांक मुकुटां सच्चम्पकस्रग्युताम्।
हस्तैर्मुदगर पाशवज्ररसना सम्बि भ्रति भूषणै। व्याप्तांगी बगलामुखी त्रिजगतां सस्तम्भिनौ चिन्तयेत्॥


ध्यान के पश्चात पीले रंग की माला से मां बगलामुखी के मंत्र का जप करना चाहिए। मंत्र इस प्रकार है :
‘‘ॐ ह्नीं बगलामुखी सर्वदुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तंभय जिह्ववां कीलय बुद्धि विनाशय ह्नीं ओम् स्वाहा’’


इस जप से मनुष्य के सभी दुखों का अंत होता है। मंत्र एक लाख अथवा पांच लाख जप के द्वारा सिद्ध और जप के बाद दशांश यज्ञ, दशांश तर्पण भी करना चाहिए। ऐसा करने से माता बगलामुखी की सिद्धि प्राप्त होती है परन्तु ध्यान रहे कि अगर सिद्धि प्राप्त हो जाए तो उसे तामसिक कार्यों अथवा अपने निजी स्वार्थ में प्रयोग न करके, देश और विश्व की मंगल कामना, धर्म की रक्षा और मानव कल्याण के लिए प्रयोग करना चाहिए।

राम-रावण युद्ध के बाद एक दिन सभी श्रीराम के सम्मुख बैठे। इस बैठक में युद्ध एवं इससे जुड़ी घटनाओं पर चर्चा हो रही थी। एकाएक श्रीराम ने पूछा कि लंका की जिस वाटिका में सीता को रखा गया था उसमें सबसे ज्यादा किस रंग के फूल थे। सीता ने कहा, ‘‘मैं अशोक वाटिका में एक माह तक रही और मैंने देखा वहां के सारे फूल सफेद रंग के थे।’’  हनुमान जी ने बड़ी विनम्रता से कहा, ‘‘प्रभु! माता सीता जी शायद भूल गई हैं। अशोक वाटिका में तो मैं भी गया था वहां की सारी वाटिका को मैंने सूक्ष्मता से देखा लेकिन वहां मैंने एक भी सफेद रंग का फूल नहीं देखा। सब फूल लाल रंग के थे।’’माता सीता मेरी धृष्टता को क्षमा करें। मातासीता और हनुमान जी दोनों के कथन परस्पर विरोधाभासी थे। अपने कथन का दोनों ने पुरजोर समर्थन किया। इससे एक विवाद की स्थिति उत्पन्न हो गई।  दोनों ही प्रत्यक्ष दृष्टा थे किंतु दोनों का कथन एक-दूसरे के विपरीत था। स्थिति को नियंत्रित करने की दृष्टि से आखिर श्रीराम ने ही उसका समाधान दिया। उन्होंने कहा, ‘‘दोनों का ही कथन सत्य है।’’  बैठक में श्रीराम के कथन ने रहस्य को और गहरा कर दिया। सबकी दृष्टि श्रीराम की ओर गई जैसे सब एक साथ पूछ रहे हों, ‘‘प्रभु! दोनों सही कैसे हो सकते हैं।’’ श्रीराम ने कहा, ‘‘सीता उस समय शांतचित थीं। अधिकांश समय वे ध्यान में मग्न रहती थीं। इसलिए पुष्प ही क्या वहां की हर चीज उन्हें सफ़ेद दिखाई दे रही थी। किंतु हनुमान उस समय सीता की व्यथा व रावण के अन्याय को याद कर क्रोधित हो रहे थे। उनकी आंखों में लाल डोरे पड़ रहे थे। इसलिए उन्हें अशोक वाटिका ही क्या पूरी लंकापुरी लाल रंग की दिखाई दे रही थी।’’ किसी ने सत्य ही कहा है कि जैसी दृष्टि-वैसी सृष्टि।

गर्मी हो या दोपहर की चिलचिलाती धूप या ठिठुरन भरे जाड़े की रात या भयंकर बारिश, फिर भी आगे बढ़ता हुजूम न तो रुकता है और न ही उसके प्रवाह में कोई कमी आती है। बस एक ही नारा लगता है, ‘‘चलो बुलावा आया है, माता ने बुलाया है, जय माता दी।’’ बस मां की महिमा आगे बढ़ती जाती है एवं सबसे आश्चर्य की बात यह है कि यहां बिना बुलाए न तो कोई आ सकता है और न ही मां के बुलाने पर कोई भी प्राणी रुक सकता है।

मां वैष्णो देवी के दर्शन के लिए आने वाले भक्तों का साल के तीन सौ पैंसठ दिन तांता लगा ही रहता है जो न कभी दिन में रुकता है और न ही रात में। मां का दरबार 24 घंटे सभी प्राणियों के लिए खुला रहता है। आश्चर्य की बात तो यह है कि मां के दरबार पर न कोई व्यक्ति का भेद, न कोई समाज का और न ही धन का भेद-भाव है। यहां तक कि मां लोगों से चढ़ावा तक नहीं लेती है बल्कि आने वाले भक्तों को अपना ही प्रसाद   सिक्के के रूप में प्रदान करती है।

मां के प्रति आस्था रखने वाले लोगों का कहना है कि वैष्णो देवी के द्वार में वही लोग पहुंच पाते हैं जिन्हें मां स्वयं बुलाती हैं। वैष्णो देवी मां के दरबार जाने के लिए कटरा से यात्रा पर्ची प्राप्त करना अनिवार्य है। यात्रा पर्ची के बिना आप यात्रा नहीं कर सकते। यह यात्रा पर्ची बस स्टैंड पर उपस्थित टूरिस्ट रिसैप्शन सैंटर, कटरा में मुफ्त एवं काफी सुविधा से मिलती है। यात्रा पर्ची के बिना यात्रियों को बाण-गंगा से वापस आना पड़ सकता है। यात्रा पर्ची सुबह 6 बजे से रात्रि के 10 बजे तक प्राप्त कर सकते हैं। भवन पर पहुंच कर यही पर्ची दिखाकर आप पवित्र गुफा के दर्शन कर सकते हैं। 

यहां विश्राम करने की व्यवस्था के साथ-साथ कम्बल, दरी, स्टोव तथा खाना बनाने के बर्तन आदि मूल्य जमा करने पर नि:शुल्क उपयोग के लिए मिल जाते हैं। इन वस्तुओं को लौटा देने पर आपका जमा किया गया रुपया पुन: वापस मिल जाता है। यह प्रबंध श्री माता वैष्णव देवी बोर्ड की ओर से किया गया है। 

आइए देखें, इस यात्रा में विशिष्ट स्थल:-

बस स्टैंड कटरा
 बस स्टैंड कटरा से ही यात्रा की शुरूआत होती है। इस स्थान पर काफी संख्या में होटल एवं धर्मशालाएं हैं जहां यात्री आने के बाद विश्राम करने के बाद बस स्टैंड पर स्थित श्री माता वैष्णो देवी श्राइन बोर्ड 1986 से यात्रा पर्ची प्राप्त कर आगे की यात्रा की शुरूआत करते हैं। यह यात्रा पर्ची नि:शुल्क दी जाती है एवं इसमें यात्रियों का विवरण तथा संख्या का उल्लेख किया जाता है।

बाण गंगा कन्या रूपी शक्ति मां जब उक्त स्थान से होकर आगे बढ़ीं तो उनके साथ-साथ वीर लंगूर भी चल रहे थे। चलते-चलते वीर लंगूर को जब प्यास लगी तो देवी ने पत्थरों में बाण मारकर गंगाजी को प्रवाहित कर दिया और प्रहरी की प्यास को तृप्त किया। इसी गंगा में ही देवी मां ने अपने केश भी धोकर संवारे इसलिए इसे बाण गंगा कहा जाता है।

चरण पादुका मंदिर 
इसी स्थान पर मां ने रुक कर पीछे की ओर देखा था कि भैरवयोगी आ रहे हैं। इसी कारण इस स्थान पर माता के चरण चिन्ह बन गए, इसलिए इस स्थान को चरण पादुका के नाम से जाना जाता है। बाण गंगा से इसकी दूरी 1.5 किलोमीटर है।

अद्धकुआरी
अद्धकुआरी इस स्थान पर दिव्य कन्या ने एक छोटी गुफा के समीप एक तपस्वी साधु को दर्शन दिए और उसी गुफा में नौ महीने तक इस प्रकार रहीं जैसे कोई शिशु अपनी माता के गर्भ में नौ माह तक रहता है। तपस्वी साधु ने भैरव को बताया था कि वह कोई साधारण कन्या नहीं अपितु महाशक्ति है और अद्धकुआरी है। भैरव ने जैसे ही गुफा में प्रवेश किया, माता ने त्रिशूल का प्रहार करके गुफा के पीछे दूसरा मार्ग बनाया और निकल गई। इस गुफा को गर्भजून एवं  अद्धकुआरी कहा जाता है। यह चरण पादुका से 4.5 किमी. दूरी पर स्थित है।

हाथी मत्था अद्धकुआरी से आगे क्रमश: पहाड़ी यात्रा सीधी खड़ी चढ़ाई के रूप में प्रारंभ हो जाती है। इसी कारण इसे हाथी मत्था के समान माना जाता है परंतु सीढिय़ों वाले रास्ते की अपेक्षा घुमावदार पहाड़ी पगडंडी से जाने से चढ़ाई कम मालूम होती है।  

सांझी छत हाथी मत्था की चढ़ाई के बाद यात्री सांझी छत पहुंचते हैं। इस छत को दिल्ली वाली छबील भी कहा जाता है। इस स्थान पर पहुंचने के बाद माता के दरबार तक केवल सीधे एवं नीचे की ओर जाने का मार्ग है। हर पल रास्ते की सफाई की जाती है। भिखारियों के भीख मांगने पर पूरी तरह से प्रतिबंध है।

माता का भवन
माता के भवन जाने के पूर्व सबसे पहले दिखाकर क्यू (लाइन) का नम्बर लेना अति जरूरी हो जाता है। इसके बाद आप क्रम से पंक्तिबद्ध होकर मां के दर्शन हेतु जा सकते हैं।ज्ञात रहे मां के पास जाने के पूर्व आप कैमरा, चमड़े का सामान, कंघी, जूता-चप्पल, बैग आदि को भवन के क्लाक रूम में जमा करा दें। इसके बाद ही आप जा सकते हैं। मां के पास जाने के बाद आपको वहां एकाग्र मन से मां का स्मरण करना पड़ेगा। यहां किसी प्रकार का फोटो एवं मिट्टी की तस्वीर नहीं है। वहां मात्र मां की पिंडी है जिसके दर्शन कर यात्रियों की थकान अपने आप दूर हो जाती हैं। मां के पीछे से शुद्ध एवं शीतल जल प्रवाहित होता रहता है जिसे चरण गंगा कहते हैं।

मां के भवन के पास ठहरने की भी अच्छी व्यवस्था के साथ ही साथ मुफ्त में कम्बल भी मिलता है जिसे प्रयोग करने के बाद लौटाना अनिवार्य है। खाने-पीने की दुकानों के अलावा प्राथमिक चिकित्सा केन्द्र, पोस्ट ऑफिस, बैंक एवं पुलिस सहायता भी यहां उपलब्ध है। 

भैरों मंदिर 
मां के दर्शन के पश्चात् आपका भैरों मंदिर जाना अनिवार्य है क्योंकि मां ने भैरों को मारने के बाद आशीर्वाद दिया था कि मेरे दर्शनों के पश्चात् भक्त तेरे भी दर्शन करेंगे, तभी उनकी मनोकानाएं पूर्ण होंगी। भैरों मंदिर का इतिहास मां आगे बढ़ती रही-भैरव पीछा करता रहा। गुफा के द्वार पर मां ने वीर लंगूर को प्रहरी बनाकर खड़ा कर दिया ताकि भैरव अंदर न आ सके। मां गुफा में प्रवेश कर गई तो पीछे-पीछे भैरव भी घुसने लगा। लंगूर ने भैरव को अंदर जाने से रोका जिसके लिए भैरव के साथ लंगूर का भयंकर युद्ध हुआ। फिर मां ने शक्ति यानी चंडी का रूप धारण कर भैरव का वध कर दिया। धड़ वहीं गुफा के पास तथा सिर भैरव घाटी में जा गिरा। जिस स्थान पर भैरों का सिर गिरा था, इसी जगह भैरों मंदिर का निर्माण हुआ है।

मां के भवन से भैरों मंदिर की दूरी लगभग 4 कि.मी. है जो काफी ऊंचाई पर है। यहां आप घोड़ा-खच्चरों से भी जा सकते हैं। मां के आशीर्वाद के कारण ही लोग वापसी में भैरों मंदिर में दर्शन के लिए जाते हैं।

आज शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि पर विनायकी चतुर्थी पर्व मनाया जाएगा। ये दिन भगवान श्री गणेश के प्रिय दिनों में से एक है। इस रोज यदि घर में पारद गणेश लाकर उनका विधान पूर्वक पूजन किया जाए तो घर में कभी कोई अभाव नहीं रहता, हर तरह का संकट नाश होता है। शास्त्रों में पारद को रसराज कहकर संबोधित किया गया है क्योंकि इसमें अलौकिक शक्ति होती है।। यदि प्रतिदिन पारद गणेश का पूजन किया जाए तो होंगे ढेरों लाभ-
 

बप्पा घर-परिवार की रक्षा करते हैं।


मंदबुद्धि भी बुद्धिमान हो जाता है।


धन का अभाव सदा के लिए खत्म हो जाता है।


दुकान अथवा गोदाम में स्थापित करने से कारोबार में वृद्धि होती है। 


पढ़ने वाले बच्चों को प्रतिदिन पारद गणपति का पूजन करना चाहिए। पढ़ाई के साथ-साथ, अन्य गतिविधियों में भी आएंगे फर्स्ट।


घर में कोई भी नकारात्मक शक्ति अपना प्रभाव नहीं बना सकती। 


पारद गणेश का पूजन करने वाले को सभी दोषों से राहत मिलती है जैसे- पितृ दोष, ग्रह दोष, कालसर्प दोष आदि।


जिस स्थान पर वास्तु दोष होता है, वहां पारद गणेश स्थापित कर देने चाहिए।


पारद गणेश के सामने हर रोज एक माला ऊं गं गणपतयै नम: मंत्र की करने से सदा के लिए दरिद्रता का अंत होता है।


बुधवार अथवा विनायकी चतुर्थी के दिन पारद गणेश की प्रतिमा पर लाल गुलाब का फूल अर्पित कर ऊं ह्रीं श्रीं गं गणपतयै नम: मंत्र का एक माला जाप करने से हर काम में सफलता प्राप्ति के योग बनने लगते हैं।

बुधवार दिनांक 18.04.18 को अक्षय तृतीया का पर्व मनाया जाएगा। वैशाख शुक्ल तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया कहा जाता है। वैदिक पंचांग के मुहूर्त प्रणाली में अंकित चार सर्वाधिक शुभ दिनों में से यह एक माना गया है। अक्षय का अर्थ है जिसका कभी क्षय न हो अर्थात जो कभी नष्ट न हो। धर्म की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अनेक अवतार लिए हैं, जिसमें नर-नारायण, हयग्रीव परशुराम के तीन पवित्र अवतार अक्षय तृतीया को उदय हुए थे। ज्योतिषशास्त्र के अनुसार इस दिन को 'सर्वसिद्धि मुहूर्त' भी कहा गया है क्योंकि इस दिन शुभ काम के लिये पंचांग देखने की ज़रूरत नहीं होती। 


शास्त्रनुसार इसी दिन से सतयुग और कल्पभेद से त्रेतायुग की शुरुआत हुई थी। जिस कारण इसे युगादि तिथि भी कहा जाता है। वैशाख में सूर्य के तेज से हर जीवधारी क्षुधा पिपासा से व्याकुल हो उठता है। अतः इस तिथि में शीतल जल, कलश, चावल, चना, दूध, दही व पेय पदार्थों का दान अक्षय व अमिट पुण्यकारी माना गया है। इस दिन गंगा-जमुनादि तीर्थों में स्नान व शिव-पार्वती व नर नारायण की पूजा का विधान है।


भगवान श्रीकृष्ण के अनुसार अक्षय तृतीया परम पुण्यमयी तिथि है। इस दिन दोपहर से पूर्व स्नान, जप, तप, होम, स्वाध्याय, पितृ-तर्पण तथा दान आदि करने वाला महाभाग अक्षय पुण्यफल का भागी होता है। अक्षय तृतीया स्वयं में महा मुहूर्त है इस दिन कीमती धातु और कपड़े खरीदे जाते हैं। इस दिन खरीदे गए कपड़े, आभूषण, ज़मीन और वाहन दीर्धकालीन लाभ देते हैं। यह दिन न केवल विवाह आदि के लिए अबूझ मुहूर्त है परंतु इस दिन लक्ष्मी-नारायण के निमित किए गए व्रत, पूजन व उपाय से दरिद्रता दूर होती है, पारिवारिक समृद्धि आती है तथा पैसे की कमी दूर होती है। 


पूजन विधि: घर के ईशान कोण में लाल कपड़ा बिछाकर, भगवान लक्ष्मी-नारायण के चित्र की स्थापना कर विधिवत पूजन करें। कांसे के दिये में गौघृत का दीप करें, सुगंधित धूप करें, गोलोचन से तिलक करें, अक्षत, रोली, सिंदूर, इतर, अबीर गुलाल आदि 16 चीजों से षोडशोपचार पूजन करें। चावल की खीर का भोग लगाएं। किसी माला से 108 बार यह विशेष मंत्र जपें। पूजन उपरांत भोग प्रसाद स्वरूप वितरित करें। 


पूजन मुहूर्त: प्रातः 08:15 से प्रातः 09:15 तक।
पूजन मंत्र: ह्रीं श्रीं लक्ष्मी नारायणाय नमः॥


शुभ मुहूर्त:
गुलिक काल -
 सुबह 10:30 से दिन 12:00 तक। 

अभिजीत मुहूर्त: बुधवार के कारण नहीं है।

राहु काल - दिन 12:00 से दिन 01:30 तक।
 
यमगंड काल - सुबह 07:30 से सुबह 09:00 तक।

अमृत वेला – शाम 16:30 से शाम 18:00 तक।

काल वेला - सुबह 09:00 से सुबह 10:30 तक।


यात्रा मुहूर्त: आज दिशाशूल उत्तर व राहुकाल वास दक्षिण-पश्चिम में है। अतः उत्तर व दक्षिण-पश्चिम दिशा की यात्रा टालें।


आज का गुडलक ज्ञान

आज का गुडलक कलर: हरा।

आज का गुडलक दिशा: पूर्व।

आज का गुडलक मंत्र: ह्रीं ह्रीं श्रीं श्रीं लक्ष्मी वासुदेवाय नमः॥

आज का गुडलक टाइम: रात 20:45 से रात 21:45 तक।


आज का बर्थडे गुडलक: पैसे की कमी दूर करने के लिए लक्ष्मी-नारायण पर चढ़ा 5 रूपये का सिक्का पर्स में रखें।


आज का एनिवर्सरी गुडलक: पारिवारिक समृद्धि के लिए लक्ष्मी-नारायण पर चढ़े मूंग किचन में स्थापित करें।


गुडलक महागुरु का महा टोटका: दरिद्रता से मुक्ति के लिए लक्ष्मी-नारायण पर चढ़ी 12 पीली कौड़ी तिजोरी में स्थापित करें। 

सोमवार दिनांक 16.04.18 को वैसाख मास की अमावस्या मनाई जाएगी। दक्षिण भारत में अमावस्यांत पंचांग के अनुसरण करने वाले वैशाख अमावस्या को शनि जयंती के रूप में भी मनाते हैं। पौराणिक किवदंती के अनुसार कालांतर में धर्मवर्ण नामक ब्राह्मण ने ईश्वर भक्ति के करण सांसारिकता से विरक्त होकर सन्यास ले लिया। एक दिन भ्रमण करते-करते वह पितृलोक जा पंहुचा, जहां उसके पितृ बहुत कष्ट में थे। पितृओं ने अपनी इस दुर्दशा का करण धर्मवर्ण के सन्यास को बताया। धर्मवर्ण के सन्यास के कारण उनकी वंशज प्रणाली समाप्त होने के करण पिंडदान करने वाला कोई शेष नहीं है। पितृओ की आज्ञा का पालन करते हुए धर्मवर्ण ने गृहस्थ जीवन की शुरुआत कर संतान उत्पन्न की व वैशाख अमावस्या पर विधि-विधान से पितृओं का पिंडदान कर उन्हें मुक्ति दिलाई। 


सोमवार होने के कारण यह अमावस्या सोमवती कहलाएगी। सोमवती अमावस्या को शास्त्रों ने अमोघ फलदायनी कहा है। मत्स्यपुराण के अनुसार पितृओं ने अपनी कन्या आच्छोदा के नाम पर आच्छोद नामक सरोवर का निर्माण किया था। इसी सरोवर पर आच्छोदा ने पितृ नामक अमावस से वरदान पाकर अमावस्या पंचोदशी तिथि को पितृओं हेतु समर्पित किया। शास्त्रनुसार इस दिन कुश को बिना अस्त्र शस्त्र के उपयोग किए उखाड़ कर एकत्रित करने का विधान है। अतः इस दिन एकत्रित किए हुए कुश का प्रभाव 12 वर्ष तक रहता है। यह दिन पितृ के निमित पिण्डदान, तर्पण, स्नान, व्रत व पूजन का विशेष महत्व है। इस दिन तीर्थ के नदी-सरोवरों में तिल प्रवाहित करने से पितृदोष से मुक्ति मिलती है। इस दिन मौन व्रत रखने से सहस्र गोदान का फल मिलता। सोमवती अमावस्या पर शिव आराधना का विशेष महत्व है। इस दिन सुहागने पति की दीर्घायु के लिए पीपल में शिव वास मानकर अश्वत का पूजन कर परिक्रमा करती हैं। आज के विशेष पूजन से सर्वार्थ सफलता मिलती है, पितृ दोष से मुक्ति मिलती है तथा सुहाग की रक्षा होती है। 


विशेष पूजन: शिवलिंग व पीपल के निमित पूजन करें। तिल के तेल का दीप करें, चंदन से धूप करें, सफ़ेद चंदन चढ़ाएं, सफ़ेद तिल चढ़ाएं, दूध चढ़ाएं, सफ़ेद फूल चढ़ाएं, खीर का भोग लगाकर 108 बार विशिष्ट मंत्र जपें। इसके बाद खीर गरीबों में बाटें।

पूजन मंत्र: वं वृक्षाकाराय नमः शिवाय वं॥
पूजन मुहूर्त: प्रातः 09:30 से प्रातः 10:30 तक।


उपाय
सर्वार्थ सफलता के लिए पीपल पर दूध चढ़ाएं। 


सुहाग की रक्षा के लिए पीपल पर की 7 परिक्रमा करें।


पितृ दोष से मुक्ति के लिए शिवलिंग पर चढ़े तिल जलप्रवाह करें।

16 अप्रैल सोमवार को सोमवती अमावस्या पर 10 साल बाद खास योग बन रहे हैं। अब से पहले 5 मई 2008 में वैशाख में सोमवती अमावस्या आई थी। इस बार यह वैशाख माह में सर्वार्थ सिद्धि व अश्विनी नक्षत्र के संयोग में मनाई जाएगी। अश्विनी नक्षत्र के स्वामी गणेश जी हैं, जो सभी विघ्नों का अंत कर देते हैं। ये योग शुभ कार्यों व दान-पुण्य के लिए सर्वोत्तम माने गए हैं। सोमवती अमावस्या साल में एक या दो बार आती है। इस दिन पवित्र नदियों में स्नान और दान का बहुत महत्व रहता है। पितृदोष निवारण के लिए तो यह दिन सर्वश्रेष्ठ है।


सोमवार का दिन भगवान शिव और चंद्र देव को समर्पित है। ज्योतिष शास्त्र में सौम्य चंद्र को रानी की पदवी प्राप्त है। अत: सरकार से चंद्र का संबंध है। चंद्र मन है। मन का संचालन चंद्र के द्वारा होता है। मन स्वस्थ होगा तो चरित्र स्वस्थ होगा। मान-सम्मान, धन, सुख, सम्मान, पुरस्कार, ललित कला का विचार चंद्र से होता है। स्त्री जाति के सम्पूर्ण शरीर का स्वामी चंद्र है।


चंद्र भी स्नेह, दया, ममता, चरित्र आदि का सूचक है। चंद्र में एक और गुण है यह अगर दूसरे ग्रह के साथ होता है तो अपने भीतर उस ग्रह का भी प्रभाव लेकर कार्य करता है। अगर स्वतंत्र है तो जिस भाव में है, उसी के अनुसार प्रभाव देता है। सूर्य के तेज से यह आलोकित होता है। अत: नेत्र का प्रकाश भी चंद्र के द्वारा देखा जाता है।


अच्छा चंद्र मानव को ज्ञानी, विवेक, दयालु, परोपकारी बनाता है। अपने परिवार-समाज के प्रति प्रेम होता है। सर्वदा अच्छे-अच्छे विचार आते रहते हैं। चंद्र सेवा करना भली भांति जानता है। शुभ चंद्र से प्रभावित स्त्री-पुरुष समाज में प्रतिष्ठित होते हैं। स्त्रियां सदैव अपने मान-सम्मान को संभालने में लगी रहती हैं। पुरुष हो तो स्त्रियों को सम्मान, स्नेह, इज्जत की दृष्टि से देखता है। अगर चंद्र निर्बल हो तो जातक के भीतर ज्ञान की कमी होती है। अच्छे-बुरे की समझ नहीं होती है। स्त्रियों के प्रति गंदे विचार  रखते हैं, पथभ्रष्ट हो जाते हैं। मन सदैव बुरे कर्मों के विषय में ही सोचता रहता है। समाज में प्रतिष्ठा खो देते हैं। ठग होते हैं। चन्द्र को बलवान करने के लिए करें ये काम-


बड़े बुजुर्गों, परिजनों का आशीर्वाद लें।


बासमती चावल, दूध एवं चांदी का दान करें।


पलंग के पायों में चांदी की कील ठोकें।


मोती अथवा चांदी उंगली में धारण करें।


दूध या पानी से भरा बर्तन सिरहाने रखकर सोएं और अगले दिन कीकर की जड़ में सारा जल डाल दें।


सोमवार का उपवास रखें।


चावल, दूध एवं पानी या दो मोती या चांदी के दो टुकड़े लेकर एक मोती या चांदी का टुकड़ा बहते पानी में बहा दें और दूसरा मोती या चांदी का टुकड़ा अपने पास संभाल कर रखें।


सफेद पुष्प चंद्रदेव को अर्पित करें।

श्री आनंदपुर साहिब सिखों की धार्मिक, राजनीतिक और सामरिक राजधानी रहा है। इसे पांच गुरु साहिबान- श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब, श्री गुरु हरिराय जी, श्री गुरु हरिकिशन जी, श्री गुरु तेग बहादुर जी और श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने अपनी चरण रज से पवित्र किया है। यहां का जर्रा-जर्रा जालिमों के खिलाफ जूझ कर शहादत पाने वाले शहीदों के आत्म बलिदान की अजीम यादगार है। पग-पग पर सिख इतिहास के अविस्मरणीय क्षणों को साकार करती श्री आनंदपुर साहिब की यह पावन भूमि सदैव आकर्षण का केंन्द्र रही है। श्री आनंदपुर सहिब का सबसे महत्वपूर्ण स्थान है- तख्त श्री केसगढ़ साहिब। सन् 1699 ई. में बैसाखी के दिन श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने यहीं खालसा पंथ की सृजना की थी। 


गुरुद्वारा ‘थड़ा साहिब’ में प्रवेश करते हुए अब भी यही प्रतीत होता है कि जैसे पंडित किरपा राम अपने साथी ब्राह्मणों के साथ नवम पातशाह श्री गुरु तेग बहादुर जी से गुहार कर रहे हैं कि हे पातशाह! हम आपकी हजूरी में आए हैं, जालिम औरंगजेब से हिन्दू धर्म की रक्षा करो, हम मजलूमों को सिर्फ श्री गुरु नानक देव जी के घर से ही मदद की उम्मीद है। गुरु नवम पातशाह ने शरणागत की लाज रखी और कश्मीरी पंडितों के मानवाधिकारों की रक्षा के लिए दिल्ली के चांदनी चौक में पावन बलिदान दिया। 
तिलक जंझू राखा प्रभ ता का।
कीनो बडू कलू महि साका।।
धरम हेत साका जिनि कीआ
सीसु दीआ पर सिररु न दीआ। 
(बचित्र नाटक)


किला आनंदगढ़ जैसे आज भी ‘रणजीत नगाड़े’ की ध्वनि से गूंज रहा है। यहां सहसा याद आ जाती है दिसम्बर सन 1704 ई. की वह भयानक सर्द रात जब श्री गुरु गोबिंद सिंह, माता गुजरी जी, साहिबजादे और कुछ सिंह किला आनंदगढ़ से बाहर निकलते हैं कि शत्रु सेना झूठे वादे एवं कसमें भुलाकर टूट पड़ती है। जूझते-जूझते जैसे-जैसे सरसा नदी पार होती है। गुरु परिवार पर कहर बरसाने वाली यह रात चमकौर की जंग में बड़े साहिबजादों की शहादत, छोटे साहिबजादों की सरहिन्द में नीवों में चिनवाकर और माता गुजरी का बलिदान लेकर शांत होती है।

गुरु साहिबान मनुष्य के आध्यात्मिक विकास के साथ-साथ उसके आर्थिक-सामाजिक विकास को भी अत्यंत महत्वपूर्ण मानते थे इसलिए उन्होंने नए-नए नगर बसाने में विशेष रुचि ली। जिस प्रकार श्री गुरु नानक देव जी ने श्री करतारपुर साहिब (पाकिस्तान), श्री गुरु अमरदास जी ने गोइंदवाल साहिब, श्री गुरु रामदास जी ने श्री अमृतसर साहिब, श्री गुरु अर्जुन देव जी ने तरनतारन साहिब और श्री गुरु हरिगोबिंद साहिब ने कीरतपुर साहिब आदि नगरों को बसाया, उसी प्रकार श्री गुरु तेग बहादुर साहिब जी ने 1665 ई. में कीरतपुर साहिब के पास ‘चक्च नानकी’ बसाया। बाद में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने 1689 ई. में एक नए नगर की नींव रखी। भाई चउपत ने ‘श्री आनंदसाहिब’ का पाठ किया। गुरु जी ने नए नगर का नाम रखा ‘आनंदपुर’, कालांतर में ‘आनंदपुर’ और ‘चक्क नानकी’ दोनों को मिलाकर ‘श्री आनंदपुर साहिब’ कहा जाने लगा।


श्री गुरु गोबिंद सिंह जी ने यहां पांच किले भी बनवाए। धीरे-धीरे श्री आनंदपुर साहिब सिखों की राजनीतिक एवं सामरिक राजधानी बन गया। फिर यहां और इसके आसपास अनेक जंगें लड़ी गईं जिनमें हर बार सिखों की फतेह हुई। श्री आनंदपुर साहिब की उन्नति और खालसे की बढ़ती जा रही शक्ति ने मुगलों और पहाड़ी राजाओं की नींद उड़ा दी। फिर ‘खालसे’ को परास्त करने के लिए एक बड़ा गठबंधन बना जिसने मार्च 1704 ई. में श्री आनंदपुर साहिब को आ घेरा। सिख संघर्ष करते रहे। धीरे-धीरे घेरा आठ महीने तक खिंच गया। अंतत: सिखों के आग्रह पर गुरु जी ने सपरिवार श्री आनंदपुर साहिब छोड़ दिया। 


1947 के बाद स्वतंत्र भारत में श्री आनंदपुर साहिब का विकास अत्यंत तेज गति से हुआ है। पांच पवित्र तख्तों में से एक तख्त श्री केसगढ़ साहिब, अनेक ऐतिहासिक गुरुद्वारे और दशमेश पिता द्वारा स्थापित पांच किले अब यहां सुशोभित हैं। गुरु जी के शस्त्र, वस्त्र समेत अनेक ऐतिहासिक महत्व की वस्तुएं यहां सुरक्षित रूप से संरक्षित की गई हैं। चौड़ी स्वच्छ सड़कें, शिवालिक की हरी-भरी पहाडिय़ों की गोद में सुशोभित सुंदर धवल गुरुद्वारा दूर से ही मन को मोहना शुरू कर देते हैं। आज श्री आनंदपुर साहिब विश्व के नक्शे पर एक विशेष स्थान रखता है। 1999 ई. में खालसा पंथ का तीन सौ साला सृजना दिवस यहां बड़े पैमाने पर आयोजित किया गया था। ‘निशान ए खालसा’ और सिख हैरीटेज सैंटर’ श्री आनंदपुर साहिब को एक महान ऐतिहासिक केंद्र के रूप में स्थापित करते हैं।


शहीदों के रक्त से रंजित यह सरजमीं ‘गुरु की नगरी’ आज सिख धर्म की गतिविधियों का महत्वपूर्ण केंद्र है। ‘होला मोहल्ला’ और ‘वैसाखी’ के अवसर पर यहां बड़ी संख्या में संगत एकत्र होती है। यहां की पवित्र वायु में श्री गुरु गोबिंद सिंह जी के ये वचन गूंजते सुनाई देते हैं:
देह सिवा बर मोहे इहे, शुभ करमन ते कभुं न टरूं।
न डरों अरि सौं जब जाय लड़ों, निश्चय कर अपनी जीत करौं। 
अरु सिख हों आपने ही मन कौ, इह लालच हउ गुन तउ उचरों।
जब आव की अउध निदान बनै अति ही रन मै तब जूझ मरों।

Separated they live in Bookmarksgrove right at the coast of the Semantics, a large language ocean. A small river named Duden flows by their place and supplies it with the necessary regelialia. It is a paradisematic country, in which roasted parts of sentences fly into your mouth.

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